बाँह डुलावति आवति राधा

Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास

Verse 29 of 33

तनक सोहागो डारिकें, जड़ कंचन पिघलाय। सदा सुहागिनी राधिका, क्यों न कृष्ण ललचाय॥ - श्री परमानन्द दास जी तनक सोहागो दारिकेन, जादा कंचन पिघले। विवाहेतर सदैव राधिका के साथ, कृष्ण लोभी क्यों नहीं.. - श्री परमानंद दास जी
मेरौ मन बाबरौ भयौआनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में