आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में
Paramanand Sagar — श्री परमानन्द दास
Verse 30 of 33
(राग गौरी व सारंग)
व्रजवासी जाने रस रीति।
जिनके हृदय और नहीं भावत नंदसुवन पद प्रीति॥ [1]
सर्व भाव सर्वात्म निवेदन रहत हैं त्रिगुणातीत।
करत महल में टहल निरंतर जात याम युग बीत॥ [2]
जिनकी गति और नहीं जाने बिच जवनिका भीति।
कोई एक लहै दास परमानंद गुरु प्रसाद प्रतीति॥ [3]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1368)
(राग गौरी वे सारंगा) व्रजवासी झेन रस रीति। भवत नन्दसुवन पद से किसे अधिक प्रेम नहीं है? [1] सभी प्राणियों की अंतिम प्रार्थना तीन प्रकार की रहती है। जटा यम युग बिट के महल में निरंतर हलचल होती रहती है.. [2] जिसकी गति अज्ञात है और इसके मध्य में जावनिका है। कोई एक लहै दास परमानन्द गुरु प्रसाद प्रतीति.. [3] - श्री परमानन्द दास, परमानन्द सागर (1368)