एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की

Prem Das Vani — श्री लाल बलबीर

Verse 11 of 11

यह रस रसिकन के लिये, रसिकहि रस बरसंत। रसिक जौहरी रस रतन, रसिकन ही पै बसंत॥ - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (106) ये रस रसिकान रसिकहि रस बरसन्त। रसिक जोहरि रस रतन, रसिकन ही पै बसंत.. - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भाई), श्री प्रेम दास जी के शब्द (106)
एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की