एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की
Prem Das Vani — श्री लाल बलबीर
Verse 2 of 11
(कवित्त)
एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की,
जानि अति लघु दृष्टि कृपा की ढरीजियै। [1]
भूली हौं मारग तुम दीजिये बताय मोय,
करुनानिधान आप अपनाय लीजियै॥ [2]
सुन्दर सुजान एहो कहत फिरत तेरी,
तेहूँ अपनाई मोई आपनी गनीजियै। [3]
वृन्दावन राजरानी तुम सों पुकार मेरी,
प्रेमसखी दासिन की दासी हू करीजियै॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)
(कविता) हे सुन्दर आत्मा, मैं बिहारी जू का प्रिय हूँ, मैं जानता हूँ, अति लघु दृष्टि की कृपा का वाहक। [1] मैं एक गलती हूं, मेरी मौत, तुम मुझसे कहो, मेरी दया स्वीकार करो.. [2] सुंदर सुजैन, मैं तुम्हारे बारे में कहता हूं, मैं तुम्हारा प्यार हूं। [3] वृन्दावन की रानी, तुम मेरे लाल की पुकार, मैं प्रेमसखी दासिन की दासी.. [4] - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भाई), श्री प्रेम दास जी की वाणी (43)