एहो सुकुमारी प्रान प्यारी हौ बिहारी जू की
Prem Das Vani — श्री लाल बलबीर
Verse 3 of 11
(कवित्त)
किधौं रूप सागर तें प्रगटे कमल जुग,
किधौं रतिराजजू के मन के हरण हैं। [1]
किधौं हर भूषण की क्षण हरण हारे,
किधौं प्राण प्यारे भारे विश्व के भरण हैं॥ [2]
किधौं हैं मराल किधौं इन्दुमण्डली के भूप,
किधौं छवि छत्र सब सुख के करण हैं। [3]
किधौं बन धरण हैं कि वन हीं धरण,
‘प्रेमसखी’ हैं सरण किधौं प्यारी के चरण हैं॥ [4]
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (25)
(कविता) कहाँ है सागर का रूप, कहाँ खिलता है कमल फिर, कहाँ है रतिरज्जु का मन। [1] कहीं खो गए हर आभूषण के क्षण, कहीं जीवन-प्रेमी संसार की पूर्णता... [2] कहीं इंदुमंडली के मोती, कहीं छवि छत्र है सुख का कारण। [3] जो वन को पकड़ते हैं वे प्रेमी हैं, प्रियतम के चरण कहाँ हैं.. [4] - श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भाई), श्री प्रेम दास जी के शब्द (25)