प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 15 of 41
जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं, जात्यौ जात बिसेष।
सोइ प्रेम जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)
जाहि बिनु कुछ न जानिये, जात-विशेष। सोइ प्रेम जाहि जानिकै, रहै न जात कुछु शेष।।- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)