प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 16 of 41
जेहि पाए बैकुंठ अरु, हरि हूँ की नहिं चाहि।
सोइ अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (28)
जहाँ वैकुण्ठ है, वहाँ हरि हूण की इच्छा नहीं रहती। सोइ अलौकिक शुद्ध शुभ, मधुर परम कहिन।।- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (28)