प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं

Prem Vatika — श्री रसखान

Verse 17 of 41

जो जातें जामैं बहुरि, जा हित कहियत वेष। सो सब प्रेमहिं प्रेम है, जग रसखानि असेष॥ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (46) जो जतेन जमीन बहुरि, जा हित कहियात वेश। सो सब प्रेम ही प्रेम है, जग रसखानि अशेष.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (46)
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिंप्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं