प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 18 of 41
कारज कारन रूप यह, प्रेम कहै रसखान।
कर्ता कर्म क्रिया करन, आपहि प्रेम बखान॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (47)
यही ऋण का स्वभाव है, यही रसखान नाम का प्रेम है। कर्ता, क्रिया, क्रिया, अपाही प्रेम बखान.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (47)