प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 20 of 41
कबहुं न जा पथ भ्रम-तिमिर, रहै सदा सुखचंद।
दिन दिन हीं बाढत रहै, होत कबहुं नहि मंद॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (8)
भले ही रास्ता भ्रम और अंधकार से भरा हो, हमेशा खुश रहें। ये दिन-ब-दिन हल्की ही जा रही है, इसकी गति कभी-कभी हल्की होने वाली नहीं है.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (8)