प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
Prem Vatika — श्री रसखान
Verse 35 of 41
प्रेम-रूप दर्पन अहो, रचै अजूबो खेल।
यामें अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (5)
हे प्रेम के दर्पण, तूने अद्भुत लीला रची है। यमन अपनो रूप कछू, लखि परिहाई अनामेल.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (5)