प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं

Prem Vatika — श्री रसखान

Verse 37 of 41

रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ, अचल महान। सदा एक रस बढ़त नित, सुद्ध प्रेम रसखान॥ - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (42) रसमय स्वाभाविक है, निष्काम है, अचल है, महान है। कल-कल रस बहे, निर्मल प्रेम रसखान.. - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (42)
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिंप्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं