साधन की आस सदाँ

Radha Shataka — श्री लाल बलबीर

Verse 2 of 4

(कवित्त) डोलत फिरत मुख बोलत में राधे राधे, और जग जालन के ख्यालन सों हट रे। [1] सोवत जागत मग जोवत में राधे राधे, राधे रट राधे त्याग उर ते कपट रे॥[2] 'लाल बलबीर' धर धीर रट राधे राधे, टरैं कोटि बाधे रट राधे झटपट रे। [3] एरे मन मेरे चेत भूलिकें न हो अचेत, राधे रट राधे रट राधे राधे रट रे॥ [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (96) (कविता) लड़खड़ाते मुंह से बोलती है, राधे-राधे, इस दुनिया में ईर्ष्या के विचारों से दूर हो जाओ बेटा। [1] सोवत जगत मग जोवत मन राधे राधे, राधे रात राधे त्याग उर ते कपाट रे..[2] 'लाल बलबीर' धर धीर रात राधे राधे, तरैन कोटि बढ़े रात राधे झटपट रे। [3] हे मन, मेरा चेतन मन अचेतन न हो जाये, राधे रट, राधे रट, राधे-राधे रट रे.. [4] - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (96)
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