(कवित्त)

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 100 of 124

(कवित्त) जग उपहासन सौं राखत न काज कछू, नारदादि भक्तन की सुधि सम्हारै ना। [1] सुबलादि सखन कौं भेटत न देख्यौ कहूँ, नंद औ जसोदा कौ सनेह मन धारै ना॥ [2] जानत पै प्रेम सीम मधुर रस सुधा की, सागर अगाधा राधा नैनन सौं टारै ना। [3] ताही सौं विहारै नव कुञ्ज सघन वीथिन में, नागर रसिक दूजी ओर हू निहारै ना॥ [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (235) (कविता) संसार में उपहास हो रहा है, कोई काम नहीं होता, नारदादि की भक्ति याद आती है। [1] मुझे सुबाल्डी के किस मित्र को नहीं देखना चाहिए? नन्द और जसोदा, किससे प्रेम करूँ? [2] संसार का प्रेम रस समान मधुर है, राधा की आँखों में सागर भरा है। [3] ताहि सौं विहारै नाव धनुष सघन हृदय से, नागर रसिक दूजी या हम निहारै ना.. [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (235)
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहिलोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि