कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा, वृंदातव्यं सदैव प
Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 117 of 124
कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा, वृंदातव्यं सदैव प्रकटतर रहो बल्लवी भाव भयो ।
भक्तानां हृतसरोजे मधुर रस-सुधा-स्यंदि पादारविन्दा, सान्द्रानन्दा कृति र्नः स्फुरतु नव-नव-प्रेमलक्ष्मी रमन्दा॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - राधा सुधा निधि - 126
कालिंदी-कुल-कल्प-द्रुम-ताल निलय प्रोललासत्केलिकन्द, वृन्दत्विन सदा प्रकट, बन बल्लवी। भक्तानां हृतसरोज मधुर रस-सुधा-सिंदी पदारविंदा, सैंड्रानंद कृति राह स्फूर्ति नव-नव-प्रेमलक्ष्मी रमांदा.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु - राधा सुधा निधि - 126