त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि मे मतिम्।

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 23 of 124

त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि मे मतिम्। नीतवत्य स्वकारुण्यात्पूर्णशा न करोषि किम॥ - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25) त्वमेव स्वपदामभोज रस चार्टमनि मे मतिम्। नितवत्य स्वकरुण्यत्पूर्णशा न करोषि किम्.. - श्री हित कृष्ण चन्द्र, श्री राधा उपसुधा निधि (25)
रस औ लुनाई की सार है नवेली बाल,लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि