(कुण्डलिया)

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 33 of 124

(कुण्डलिया) जाकी दृगन कटाक्ष सर, विंध्यो नन्दसुत-वीर। मूर्छित ह्वै अवनी लुठत, पुनि-पुनि विकल अधीर॥ [1] पुनि-पुनि विकल अधीर, निपट कसरत उर अंतर। वंशी कहुँ खस परी गिरयौ, कहुँ मुकुट मोर पर॥ [2] विगलित पीत दुकूल, सुरति नहिं नेंकहु ताकी। कब मैं रसजुत करहुँ, हरषि परिचरिया जाकी॥ [3] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (38) (राशिफल) जाकी दृगन कटाक्ष सार, विन्धो नंदसुता-वीर। मूरचित हवै अवनि लुथाट, पुनि-पुनि विकल अधीर.. [1] पुनि-पुनि विकल अधीर, निपट करत उर अंतर। किस वंश को मैं कहूँ, तुम तो व्यक्ति विशेष पर गिरी हो, मोर पर मुकुट को क्या कहूँ.. [2] पिघले पिता के कुल, सुरति नहिं नेनकाहु ताकी। हरषि परिचर्या जाकी कब तैयार होगी.. [3] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (38)
हा राधे स्वामिनि कदा किशोरी दिव्य रूपिणी।वैष्णवानन्दकोटिर्वा ब्रह्मानन्दादि कोटयः।