(कवित्त)
Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Verse 52 of 124
(कवित्त)
जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं,
बेद शिरोभाग उपनिषद न पावैं लख। [1]
जासु रूप ध्यान अति दुर्गम शुकादिकन कौं,
प्रेम सुधा माधुरी की सार जोई शिख नख॥ [2]
छवि सिंधु बोरी नित्य नवलकिशोरी भोरी,
वदन की शोभा मानो चली रूप सीवां नख। [3]
ताकी मुख शोभा अति अद्धुत निहारिवे कौं,
व्याकुल रहत ललचात नित मेरे चख॥ [4]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (76)
(कविता) वह कौन सा परम तत्व है, जिसे वृन्दावन में प्रकाश नहीं मिलता? [1]. [3] जिनके मुख का सौंदर्य अत्यंत अद्भुत है, जो बेचैन रहते हैं और हर दिन मेरे स्वाद को तरसते हैं.. [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (76)