(छप्पय)

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 53 of 124

(छप्पय) धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं। कहा तिन की बतरान वृथा कीजै बिन काजैं॥ [1] हरि की भक्ति अनन्य महा पदवी कहि गाई। सिर माथे पै रहौ कहौं पै निज मन भाई॥ [2] अद्भुत नवल किशोरी मणि वसत कुंज वृन्दाविपिन। रुचत न मेरौ मन कहूँ जासु रसामृतदास्य बिन॥ [3] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77) (छप्पय) धर्म, अर्थ, फल, काम, मोक्ष सब दूर बैठे हैं। अपने चचेरे भाई के बिना टिन का बर्तन कहाँ बेकार है? [1] हरि की भक्ति दूसरा महान गुण कहा गया है। मस्तक पर रहो श्रीमान, मन में कहाँ रहूँ भाई.. [2] अद्भुत नवल किशोरी मणि वसत कुंज वृंदाविपिन। रुचत् न मेरु मन कहुँ जसु रसामृतदास्य बिन.. [3] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77)
(कवित्त)लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि