जे नहि लोक वेद गति जानहिं।

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 74 of 124

जे नहि लोक वेद गति जानहिं। कुल परपाटी चित न आनहिं॥ [1] सत संतन आचरण घनेरे। तिनहूँसौ राखत मन फेरे॥ [2] ब्रज मणि नवलकिशोर-किशोरी। तिन छवि रस गति मति जिन बोरी॥ [3] गुप्त रहस्य भाव थिर मन में। ते साधारण पुरुष न जनमें॥ [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (146) हाँ, मैं वेदों की गति नहीं जानता। कुल परपति चित न अनाहिं..[1] सत संत चरण घनेरे। तिनहुंसौ राखत मन फेर.. [2] ब्रज मणि नवलकिशोर-किशोरी। तिन छवि रस गति मति जिन बोरि..[3] भूत रष्ट भव तिर नर नर। ये साधारण पुरुष पैदा नहीं होते.. [4] - श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (146)
(कवित्त)लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि