लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि

Radha Sudha Nidhi — श्री हित हरिवंश महाप्रभु

Verse 93 of 124

सान्द्र प्रेम-रसौघ-वर्षिणि नवोन्मीलन्महामाधुरी, साम्राज्यैक-धुरीण केलि-विभवत्कारूण्य कल्लोलिनि। श्रीवृन्दावनचन्द्र-चित्त-हरिणी-बन्धु स्फुरद्वागुरे, श्रीराधे नव-कुञ्ज-नागरि तव क्रीतास्मि दास्योत्सवै:॥ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (206) सांद्रा प्रेम-रसौघ-वर्षिणी नवोनामिलन महामाधुरी, अनिमेषिका-धुरिन केलि-विभवत्करुनि कल्लोलिनी। श्री वृन्दावन चन्द्र-चित्त-हारिणी-बन्धु स्फुरद्वगुरे, श्री राधे नव-कुंज-नागरी तव कृतस्मि दास्योत्सवै:.. - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (206)
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहिलोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि