राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 10 of 51
(कवित्त)
ध्यावत महेश हू गनेश हू धनेश हू,
दिनेश हू फनेश त्यौं मुनेस मनमानी है। [1]
तीनों लोक जपत त्रिताप की हरन हार,
नवौ निध्दि सिद्धि मुक्ति भई दरबानी है॥ [2]
कीरति दुलारी सेवैं चरन बिहारी धन्य,
जाको कित्त नित्त विधि वेदन बखानी है। [3]
साधा काजपल में अराधा छिन आधा हठी,
बाधा हरिबे को एक राधा महारानी है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (52)
(कविता) ध्यावत मैं महेश हूं, मैं गणेश हूं, मैं धनेश हूं, मैं दिनेश हूं, मैं मनमाना हूं। [1] तीन लोक के हरण हर हरण, जपत त्रिताप, नवौ निधि सिद्धि मुक्ति भाई दरबी। [2] कीर्ति दुलारी सेवई चरण बिहारी धन्य हैं, जाकर बताओ नित कितने अनुष्ठान। [3] साध काजपाल में, अराध छिन अधा हाथी, बढ़ हरिबे को एक राधा महारानी.. [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (52)