राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 14 of 51
(कवित्त)
हीन हौं, अधीन हौं तिहारो ब्रज-साहिबनी!
हिय में मलीन करुना की कोर ढरिए। [1]
भारी भवसागर में बोरत बचायौ मोहिं,
काम क्रोध लोभ मोह लागे सब अरिए॥ [2]
बुरो-भलो, जैसो-तैसो, तेरे द्वार पर्यौ हौं तौं,
मेरे गुन-औगुन तूं मन में न धरिए। [3]
कीरति-किसोरी, वृषभानु की दुहाई तोंहिं,
लच्छ-लच्छ भाँति सों 'हठी' को पच्छ करिए॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (50)
(कविता) मैं यहीं हूं, मैं तुम्हारे अधीन हूं, ब्रज-साहिबानी! हे गरीब आदमी, करुणा की जड़ पकड़ो। [1] मोहिं, मुझे इस संसार सागर के बोझ से मुक्त करो, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि सभी नष्ट हो गये हैं। [2] सब बुरे लोग हैं, मैं तेरे द्वार पर हूं, मेरे गुणों को मेरे मन में न रखो। [3] कीर्ति-किशोरी वृषभानु से विनती करती हुई अपने पुत्र 'हाथी' को हर छोटी चीज की तरह चाटती रही.. [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (50)