राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 17 of 51
(कवित्त)
काहू को शरन शम्भु गिरिजा गणेश शेष,
काहू को शरन है कुबेर ऐसे घोरी कौ। [1]
काहू को शरन मच्छ कच्छ बलराम राम,
काहू को शरण गोरी साँमरौ सौ जोरी कौ॥ [2]
काहू को शरन बौद्ध वामन वराह व्यास,
यही निराधार सदाँ रहै मति मोरी कौ। [3]
आनंद शरण बिधि वंदित चरन एक,
हठी को शरन बृषभानु की किशोरी कौ॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (1)
(कविता) किसको मिला आश्रय, शंभु गिरिजा, गणेश शेष, किसको मिला आश्रय, कुबेर, कौन इतना गोरा। [1] काहू के आश्रय मच्छ कच्छ बलराम राम, काहू के आश्रय गोरी सामरौ सौ जोरी कौ.. [2] काहू के आश्रय बौद्ध वामन वराह व्यास हैं, अर्थात् मेरी मृत्यु निराधार घर में ही रहती है। [3] आनंद शरण बिधि वंदित चरण एक, हाथी को शरण बृषभानु की किशोरी कौ.. [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (1)