राधिके काहे करो हठ री

Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी

Verse 19 of 51

कीरति, कीरति कुँवरि की, कहि कहि थके गणेश। दस सत मुख बरनन करत, पार न पावत शेष॥ - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (2) कीर्ति, कीर्ति कुंआरी, कहीं थके हुए गणेश। दास अपनी सच्ची बातें कहते रहते हैं, लेकिन उनकी पहचान नहीं बचती.. - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (2)
राधिके काहे करो हठ रीराधिके काहे करो हठ री