राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 20 of 51
(कवित्त)
कोमल विमल मंजु कंज के अरुण सोहैं,
लच्छन समेत शुभ शुद्ध कंदनी के हैं। [1]
हरी के मनालय निरालय निराकारन के,
भक्ति बरदायक बखाने छन्दनी के हैं॥ [2]
ध्यावत सुरेश शम्भु शेष औ गणेश खुले,
भाग अवनीके जहाँ मन्द परै नीके है। [3]
कटै जन फंदनीय द्वंदनीय हरिहर,
वंदनीय चरण वृषभानु नन्दनी के है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (3)
(कविता) केएनजे के कोमल विमल मंजू अरुण सोहेन, शुभ शुद्ध कंदानी के साथ लछन। [1] हरि का गुणगान अद्वितीय संकल्प का है, भक्ति महान चांदनी की है... [2] ध्यावत सुरेश शंभु विश्राम गणेश खुले, जग का वह भाग जहां मंद पराये आते हैं। [3] वंदनीय हरिहर जन जन के, वंदनीय चरण वृषभानु नंदनी के। [4] - श्री हाथी जी, राधा सुधा शतक (3)