राधिके काहे करो हठ री

Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी

Verse 25 of 51

(सवैया) मोरपखा गर गुन्ज की माल, किये नव भेष बड़ी छबि छाई। [1] पीतपटी दुपटी कटी में, लपटी लकुटी हठी मो मन भाई॥ [2] छुटी लटैं डुलै कुण्डल कान, बजै मुरली धुनि मन्द सुहाई। [3] कोटिन काम गुलाम भये, जब कान्ह ह्वै भानलली बनि आई॥ [4] - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (35) (सवैया) मोरपखा गर गुंज का माल, नये भेष में महान छवि। [1] पितापति दुपति कटि पुरुष, लपति लकुटी हाथी मो मन भाई.. [2] छुति लटैं दुलै कुंडल कण, बाजै मुरली धुनि मंद सुहाई। [3].
राधिके काहे करो हठ रीराधिके काहे करो हठ री