राधिके काहे करो हठ री
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 31 of 51
(सवैया)
राधिके काहे करो हठ री, सुनरी बर बोल पियूष से पी के। [1]
भौंहैं चढ़ाय कहा सतराइ के, नैन नचाय बकै गुन सीके॥ [2]
संभु सुरेश गनेश न पावत, प्रेम के डोरे बँधे तुब ही के। [3]
मानो मनायो पराऊँ परे, मन भावन मोहन भावते जी के॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (65)
(सवैया)राधिका तुम हार क्यों मानती हो, पियूष से पी लो और सुनारी से एक बार और कहो। [1] तारों ने भौहें कहाँ उठाईं, नचायीं आँखें शेष बन्दूक से... [2] स्नेहु सुरेश गणेश नहीं माने, केवल टब प्रेम के धागे से बँधा था। [3] मनो मनयो परौं पारे, मोहन भवेते जी के मन भवन.. [4] - श्री हाथी जी, श्री राधा सुधा शतक (65)