बैठी रंग भरी है रंगीली रंग रावटी में
Radha Sudha Shataka — श्री हठी जी
Verse 47 of 51
(कवित्त)
जन दुःखहरनी धरैनी यति ध्यावें तोहि ,
तेरी जग कर्नी विधि बर्नी बड़े स्यान की। [1]
चिन्ता कैसो घेरा मन ढेरा सौ भ्रमत फिरै ,
हृदै नहीं डेरा सुधि खान की न पान की॥ [2]
ध्यावत बनै न मोहि तेरोई कहावत हौं ,
हठी पै कृपा की कोर राखि दया दान की। [3]
औगुन भरोरी हौं कहत कर जोर अब ,
मोरी पच्छ कर तू किसोरी वृषभान की॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)
(कविता) जन दुखहरणी धरैनि यति ध्यावे तोही, तेरी जग करणी विधि बरनि बड़े सियान की। [1] मन कैसे चिंताओं से घिरा रहता है, मन बहुत भ्रम में घूमता है, मन हृदय की स्मृति में नहीं बसता है.. [2] ध्यावत बने न मोहि आपकी कहावत है, दया का हृदय हाथी के चरणों में रखा जाता है, और दया का दान किया जाता है। [3] मैं जोर से कह रहा हूं 'ओगुन भरोरी हूं', अब किसोरी वृषभान की तरफ पीठ कर लो.. [4] - श्री हाथी जी, श्री राधा सुधा शतक (51)