अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्
Radhashtakam Stotras —
Verse 28 of 35
एतद्दष्टकं सुचारुं सर्व सद्गुणाधिके। वर्णितं त्वदीय मोहनेन सुष्ठु राधिके॥
प्रेमतस्य वर्द्धय स्वपाद सेवने सदा, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (9)
इतद्दष्टकं सुचारुं सर्व सद्गुणाधिके। आचार्यतम त्वदीय मोहनेन सुषथु राधिके.. प्रेमत्स्य वर्ध्य स्वपाद सेवने सदा, राधिका महान भजे निकुंज धाम वासिनिम.. - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम् (9)