अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्
Radhashtakam Stotras —
Verse 29 of 35
गोकुलेन्द्र सुनूमत्त भृंग चारु मल्लिकां, शुद्ध भावना स्वकीय भक्ति कल्प वल्लिकाम्।
नव्य यौवन प्रमोद मंजुमन्द भाषिणीं, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (1)
गोकुलेन्द्र सुनुमत्त भृंग चारु मल्लिकम्, शुद्ध भावना, आत्मभक्ति, कल्प वल्लिकम्। नव्या यौवन प्रमोद मंजुमंद भाषिणीम्, राधिका महान् भजे निकुंज धाम वासिनिम्.. - श्री मोहनचंद जी, श्री राधाकाष्टकम् (1)