अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्

Radhashtakam Stotras —

Verse 31 of 35

इन्द्र गोप कान्ति हारिम्, चारु शैल धारिणीम्, भ्रूविलास राशि तृष्ण कृष्ण चित्त हारिणीम्। श्यामसुन्दर प्रमोद वृद्धि, मन्द हासिनीम्, राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥ - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (2) इंद्र गोप कांति हारिणीम, चारु शैल धारिणीम, भ्रुविलास राशि तृष्णा कृष्ण चित्त हारिणीम। श्यामसुंदर प्रमोद वृद्धि मंद हंसिनिन, राधिका महान भजे निकुंज धाम वासिनिन.. - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम् (2)
अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्