अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्
Radhashtakam Stotras —
Verse 32 of 35
मंजु मेघ सार गन्ध सार सार रूषिताम्। मुर्द्धनील बिन्दु नासिकारुणा विभूषिताम्॥
प्राणनाथ संतताभि संगमा विलासिनीं। राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥
- श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (6)
मंजु मेघ सार गंध सार सार रुषितम्। मूर्धनिल बिन्दु नासिकारूणा विभूषितम्।।प्राणनाथ संतभि संगम विलासिनिन्। राधिका महान भजे निकुंज धाम वासिनिम.. - श्री मोहनचंद जी, श्री राधाकाष्टकम् (6)