अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्

Radhashtakam Stotras —

Verse 33 of 35

प्रीति विह्वल प्रिय प्रकृष्ट वक्ष शयिनीम्। नम्र वक्त्र सूक्तिभिर्मुकुन्द भावदायिनीम्॥ प्रेममत्तता भरेण कोटि काम हासिनीम्। राधिका महं भजे निकुञ्ज धाम वासिनीम्॥ - श्री मोहनचंद जी, श्री राधिकाष्टकम (8) प्रीति विह्वल प्रिय प्रकृष्ट वक्ष शयनीम। नम्र वक्ता सूक्तिभिर्मुकुन्द भवदायिनीम्। राधाका महान भजे निकुंज धाम वासिनिम.. - श्री मोहनचंद जी, श्री राधाकाष्टकम् (8)
अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्अंग सन्निधानरत्न मंडल प्रमंडिनीम्