रसिकवर रसिकनी रस रासि

Ras Ke Pada —

Verse 4 of 28

आजु की शोभा कही न जाइ। श्रीहरिदासी विपुल विहारिनि सरस नागरी गाइ॥ [1] नरहरि रसिक सुललित किसोरी मोहिनी ललित सुख पाइ। चतुर स्वामिनी की छवि ऊपर, निरखि निरखि बलि जाइ॥ [2] - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4) आज कहीं कोई सुंदरता नहीं है. श्री हरिदासी विपुल विहारिणी सरस नागरी गाई.. [1] नरहरि रसिक सुलालित किसोरी मोहिनी ललित सुख पै। ऊपर चतुर स्वामी की छवि, निरखि निरखि बालि जय.. [2] - श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (4)
रसिकवर रसिकनी रस रासिरसिकवर रसिकनी रस रासि