हमरे सुख कौ वपु बन्यौ

Ras Ki Sakhi —

Verse 4 of 6

पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई। सखीभाव तब जानिए, निर्विकार तन होई॥ - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, रस की साखी (12) पुरुष भाव नहीं गया, मन पुरुष ही रहता है। मित्रता का अर्थ तभी जानें जब आपका शरीर विकारों से मुक्त हो.. - श्री रसिक देव जी, रस के मित्र श्री रसिक देव जी के वचन (12)
हमरे सुख कौ वपु बन्यौहमरे सुख कौ वपु बन्यौ