दूलह दुलहिन अधिक बनी
Rasik Dev Vani — श्री रसिक देव
Verse 1 of 9
(राग बिहागरौ)
दूलह दुलहिन अधिक बनी।
पूजन चली कल्पतरु सुन्दरि औरहि ठान ठनी॥ [1]
कियो है सखिन गठ जोर सबन मिलि आगे धन पाछे जु धनी।
गावत चली गीत मंगल के सबही सुघर सजनी॥ [2]
रुनक झुनक पग धरत धरनि पर छबि पावत अवनी।
छिरकि सुगन्ध मूल तरु पूज्यौ फूलनि माल धनी॥ [3]
अंचल जोरि यहै वर मांगौं रहौ यह प्रेम सनी।
श्री रसिक बिहारिनि होहु न मान छक केल कला कमनी॥ [4]
- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (25)
(राग बिहागरौ) दूल्हा-दुल्हन और भी खूबसूरत हो गए. पूजा जारी रही, कल्पतरु सुंदरी औरहि ठन ठन.. [1] सखिन को सबकी आयु और धन का बल क्यों मिला? गावत चली गीत मंगल के सभी सुघर सजनी.. [2] रूणक झुनक पग धरत धरनी पर छवि पावत अवनी। चिरकी सुगंध मूल तरु पूज्यौ फुलाणी माल धनी.. [3] आंचल जोरी है, मांगौं रहो रहो ये प्रेम सानी। श्री रसिक बिहारिणी होहु न मन चक केल काला कामनी.. [4] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांत के सिद्धांत (25)