रसिक शिरोमनि सांवरो गौरी अद्भुत रूप
Rasik Mnjari — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 4 of 5
प्रीतम कै धन प्यारी ए, प्यारी कै धन पीय।
और कछु न रूचैं इन्हैं, इहि विधि ज्यावत जीय॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (11)
अपने प्रियतम का धन, अपने प्रियतम का धन, अपने प्रियतम का धन पियो। और उन्हें किसी भी चीज़ में कोई दिलचस्पी नहीं है, यही जीवन का तरीका है... - श्री रूपरासिक देवाचार्य, रसिक मंजरी (11)