लाख अंग हरि भक्ति के, चौसठ महा प्रकास।

Rasik Mohini — श्री प्रियादास

Verse 10 of 27

लाख अंग हरि भक्ति के, चौसठ महा प्रकास। ताहू में पुनि पांच कहि, कह्यौ एक वनवास॥ - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (4) कोटि हरि भक्ति, चौसठ महान ज्योत। ताहु पुरुष पुनि पंच कहाँ, एक वनवास कहाँ.. - श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (4)
खान पान सुख भोग की, जो लों मन में भूख।मिल्यौ सबै कछु जो कभूँ मान्यौ आपनि हाल।