Rasik Mohini

Rasik Mohini

श्री प्रियादास · 27 verses · Braj

  1. 1. बरसानो वृषभानु को, लखी साँकरी खोर।
  2. 2. भूतल में वृंदा विपिन, ए सर्वोपरि आहि।
  3. 3. भूमि सुभग तरु लता छवि, सुधि बुधि सब हर लेत।
  4. 4. दरसन मिलवो बोलिवो, रसिक जननि सों होय।
  5. 5. ढिंग विलास-गढ़ दान-गढ़, और मान-गढ़ नाम।
  6. 6. जब वृन्दावन धाम के प्यारे लागें रूष।
  7. 7. जो है तो में मति कछू, वस वृन्दावन षेत।
  8. 8. कौन भूमि की माधुरी, डोलनि परमानंद।
  9. 9. खान पान सुख भोग की, जो लों मन में भूख।
  10. 10. लाख अंग हरि भक्ति के, चौसठ महा प्रकास।
  11. 11. मिल्यौ सबै कछु जो कभूँ मान्यौ आपनि हाल।
  12. 12. निपट प्रबल साधन करें, तऊ मिलै तन त्याग।
  13. 13. Nipat Prabal Sadhan Karein Tau Mile Tan Tyag
  14. 14. परम रसिकनी लाड़िली, जाको महल रसाल।
  15. 15. फिरति रहे वन भूमि में, झूमि नैन अकुलाय।
  16. 16. प्रभुता दासी ह्वैं रहे, ढूंढ़े मिलैं न मूल।
  17. 17. प्रगट करी व्रज भूमि मधि, श्री वृंदावन धाम।
  18. 18. प्रेम सरोवर प्रेम सों, पूरन परम रसाल।
  19. 19. राधा वल्लभ लाल को, दुर्लभ दरसन पाय।
  20. 20. रसिक जननी के संग सों न्यारो कभू न होय।
  21. 21. रीझि परे छवि धाम पर, करि नौंछावरि देह।
  22. 22. श्री बैकुंठ गोलोक लों, गए परम रस चाह।
  23. 23. श्री वृंदावन धाम में, साधक सुख अवगाऊ।
  24. 24. श्री वृंदावन माधुरी मदलों चढ़ी विसाल।
  25. 25. सोवत जागत रैन दिन, चलत फिरत सुष होत।
  26. 26. ताते वृंदावन बसो, वृंदावन लेवो नाम।
  27. 27. तजि के सब पौरस प्रबल, मानें तन गुण हीन।