वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 10 of 16

मो निरधनि कौ धन गिरिधारी। मेरी छगन-मगन मनमोहन, मम आँगन कौ चंद बिहारी॥ [1] लखि याकौ मुख-चंद जियत हौं, या बिन सब जग में अँधियारी। या के बदले जो कछु चाहें, देऊँ रतन-धेनु धन भारी॥ [2] - रसिक वाणी कौन गरीब है और किसके पास दौलत? मेरी छग-मगन मनमोहन, मम आंगन कौ छंद बिहारी..[1] लखि याकौ मुख-छंद जीत है, या सं सब जग अधियार। अथवा जो कुछ तुम चाहो उसके बदले मैं तुम्हें बहुमूल्य पत्थर और रत्न दे सकता हूँ.. [2] - रसिक वाणी
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