वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 11 of 16

मोरकुटी और दान मान गढ़, गढ़ विलास सुख पइये। गहवर वन की बैठ लतन में, श्रीराधा - राधा कहिये॥ [1] सदा-सर्वदा पर्वत ऊपर, नित-प्रति चढ़कर जइये। लाड़िलीलाल के दर्शन पाकर, तन-मन-नयन सिरैये॥ कहे दास बास बरसानो, बड़े भाग्य तें पइये॥ [2] - रसिक वाणी मोरकुटी और दान, गधा और गधा सुख भोगते हैं। गहन वन की घाटी में बैठो, श्री राधा-राधा कहो.. [1] चढ़ो सदा पर्वत, चढ़ो सदा शिखर नीता-प्रति। लड़ई लाल को देखकर मेरा तन, मन और आंखें भर आईं... दास ने कहा, बस नहा लो, बड़ा सौभाग्य मिलेगा... [2] - रसिक वाणी
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