वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 9 of 16

मेरे एक राधा नाम आधार। कोउ देखत निज रूप ब्रह्म पर, निराकार अबिकार॥ [1] कोउ कमलापति कोउ गिरिजापति नाम-रूप उर-धार। भक्त-कल्पतरु राम-कृष्ण कोउ सेवत अति सत्कार॥ [2] हौं जड़ मति, अति मूढ़ हठीलौ, नटखट निपट गँवार। राधे-राधे रटौं निरन्तर, मानि सार कौ सार॥ [3] - रसिक वाणी मेरा एक राधा नाम आधार। जो ब्रह्म से परे, निराकार और निराकार में अपना स्वरूप देखता है। [1] कमलापति कौन, गिरिजापति कौन, नाम-रूप और जल। भक्त-कल्पतरु, जो राम-कृष्ण की अत्यंत आदर से सेवा करते हैं.. [2] मैं मंदबुद्धि, अत्यंत मूर्ख, शरारती और असंस्कृत हूं। निरंतर जपें राधे-राधे, मनि सार कौ सार.. [3] - रसिक वाणी
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