वसिये श्री वृन्दावन धाम
Rasik Vani — रसिक वाणी
Verse 2 of 16
(कवित्त)
बरसानौ गाम निज धाम श्री प्यारी जू कौ,
ताके निज सेवक सो करत खवासी है। [1]
भूमि ही सौ काम नाम रटै श्री राधे जू कौ,
मूरख बिमुख लोग जानत उदासी है॥ [2]
भक्तन के दास आस राखै श्री किशोरी जी की,
भोरे से दीखै ये बड़े सुखरासी है। [3]
कुमरि लड़ेती जू की खेलन की ठौर रहै,
औगुन अनेक भरे तौ हू बृजवासी है॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
(कविता) बरसानौ गम निज धाम श्री प्यारी जू कौ, टेक निज सेवक सो करत खवासी है। [1] सौ कारण से श्रीराधे नाम को भूमि ने ही रट रखा है, दुःख तो मूर्ख और अज्ञानी जानते हैं.. [2] श्री किशोरी जी को भक्तों का सेवक बना दिया है, सुबह से ही दिखा दिया है कि वे बहुत प्रसन्न हैं। [3] खेल के मैदान में लेटी कुमारी, ओगुन भरे अनेक, तू है ब्रज की वासी.. [4] - ब्रज की कविता