वसिये श्री वृन्दावन धाम

Rasik Vani — रसिक वाणी

Verse 3 of 16

चरण कमल बन्दौं प्यारी के। रसिक जनों की प्राणनाथ श्रीराधा बरसाने वारी के॥ [1] जे पद कमल सखिन उर भूषण कीरति राजकुमारी के। सोई चरण वृन्दावन बीथिन बिहरत संग बिहारी के॥ [2] मोहन जिन्हें प्यार से चाँपत कोमल चरण सुकुमारी के। रे मन छोड़ ना कबहुँ चरणाम्बुज वृषभानु दुलारी के॥ [3] - रसिक वाणी प्रियतम के चरण कमल। श्रीराधा, बरसाना के प्राणनाथ, रसिक जनन की वारी..[1] कमल सखिन नाम भूषण कीर्ति राजकुमारी। बिहार और बिहारी के बीच में सोये वृन्दावन के चरण.. [2] मोहन सुकुमारी के कोमल चरणों का दीवाना था। अरे, मैंने अपना मन कब छोड़ा? चरणाम्बुज वृषभानु दुलारी की। [3] - रोमांटिक भाषण
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