वसिये श्री वृन्दावन धाम
Rasik Vani — रसिक वाणी
Verse 6 of 16
कहि न जाय मुखसौं कछू स्याम-प्रेम की बात।
नभ जल थल चर अचर सब स्यामहि स्याम दिखात॥ [1]
ब्रह्म नहीं, माया नहीं, नहीं जीव, नहि काल।
अपनीहू सुधि ना रही, रह्यो एक नँदलाल॥ [2]
को कासों केहि विधि कहा, कहै हृदैकी बात।
हरि हेरत हिय हरि गयो हरि सर्वत्र लखात॥ [3]
- रसिक वाणी
जय मुखसौं को ना कहो, स्याम से प्रेम की बात करो। आकाश, जल और पृथ्वी चार स्थिरांक हैं, सभी एक ही समय में दिखाई देते हैं.. [1] कोई ब्रह्म नहीं है, कोई माया नहीं है, कोई जीव नहीं है, कोई काल नहीं है। नन्दलाल को अपनी याद ही न रही। [2] कानून किसे कहते हैं, हृदय का भार किसे कहते हैं। सर्वत्र हरि हरत हिय हरि गयो हरि लिखा है। [3] - रोमांटिक भाषण