वसिये श्री वृन्दावन धाम
Rasik Vani — रसिक वाणी
Verse 8 of 16
(कवित्त)
काया शुद्ध होत जब ब्रज रज उड़ि अंग लगे।
माया शुद्ध होत कृष्ण सेवा पे लुटाये ते। [1]
शुद्ध होत कान कथा कीर्तन के श्रवण किये।
नैंन शुद्ध होत दर्श युगल छवि पाये ते॥ [2]
हाथ शुद्ध होत श्री ठाकुर की सेवा किये।
पावं शुद्ध होत श्री वृन्दावन जाये ते। [3]
मस्तक शुद्ध होत श्री बिहारी जी के चरण परे।
रसना शुद्ध होत श्यामा-श्याम गुण गाये ते॥ [4]
- ब्रज के कवित्त
(कविता) शरीर को शुद्ध करने से शरीर शुद्ध हो जाता है। यदि आपने स्वयं को कृष्ण की सेवा में समर्पित कर दिया होता, तो माया शुद्ध हो गई होती। [1] शुद्ध गरम कथा कीर्तन सुना। आँखें स्पष्ट हो जाती हैं और युगल की छवि गायब हो जाती है.. [2] हठ पवित्र हो जाता है और श्री ठाकुर की सेवा करता है। पवित्र बनने के लिए श्री वृन्दावन में जायेंगे। [3] श्रीबिहारी जी के चरणों पर पैर रखते ही मस्तक पवित्र हो जाता है। श्याम-श्याम के गुण गाने से, सार निर्मल हो जाता है.. [4] - ब्रज के कवि