मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 12 of 39
(सवैया)
जा दिन ते मुसकानि चुभी चित,
ता दिन ते निकसी न निकारी। [1]
कुंडल लोल कपोल महा छबि,
कुंजन ते निकस्यौ सुखकारी॥ [2]
हौं सखि आवत ही दगरें,
पग पैंड तजी रिझई बनवारी। [3]
'रसखानि' परी मुसकानि के पाननि,
कौन गनै कुलकानि बिचारी॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) मेरे चेहरे पर हर दिन मुस्कान थी, लेकिन वहां से कोई नहीं निकलता था. [1]. [3] 'रसखानि' परी मसकानी के माता-पिता, कौन जाने बिचारी कुलकानि.. [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली