मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 18 of 39
(सवैया)
खंजन नैन फंसे छवि पिंजर, नाहिं रहैं थिर कैसेहु माई।
छूटि गई कुल कानि सखी, ‘रसखान’ लखी मुसकानि सुहाई॥ [1]
चित्र लिखी सी भई सब देह। न वैन कढ़ै मुख दीन्हें दुहाई।
कैसी करूं जित जाऊं तितै, सब बोलि उठैं वह बांवरी आई॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) आँखों में कैद पिंजरे की छवि, स्थिर नहीं हूँ मैं, कैसे हूँ मैं? छुति गै कुल कानि सखी, 'रसखाना' लिखा मुस्कान सुखदाई।।[1] भाई सब शरीर लिखा भाई। जब कढ़ाईदार मुँह ने उन्हें बुलाया। जौन तिताई कैसे जीतूँ सब कहने लगे वाह बनवारी ऐ.. [2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली