मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 19 of 39
(सवैया)
खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को, ता मुख की उपमा किहिं दीजै।
देखत ही बनि आवै भलै, रसखान कहा है जो बार न कीजै॥ [1]
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै, एक लई यह दूसरी लीजै।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सों, हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) तुम खेल खेलते हो और अपने प्रिय को लिखते हो, तुम मुझे अपने चेहरे की झलक क्यों नहीं देते। देखते ही आ जाओ, कहां है रस का प्याला जो छलकता नहीं... [1] जैसे ही सुंदरी कहती है, एक ले लो, एक ले लो, दूसरा ले लो। त्यूं त्यूं छबीलो चकै छबि चक सो, हेरै हंसे न तरै खरौ भीजै।।[2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली